पूज्य साध्वी संवेगनिधि श्रीजी म॰ सा॰

मनुष्य जीवन में दुर्लभ हैं पांच सकार॰॰॰॰॰॰ जीवन में सुवास देता है विनयभाव॰॰॰॰॰॰ अनुभव में होता है जीवन का सार॰॰॰॰॰॰ आप स्वयं परिवार के लिये आदर्श स्थापित करें॰॰॰॰॰॰ संकल्प करने से असंभव भी संभव बन जाता है॰॰॰॰॰॰ धन का उपयोग दो क्षेत्रों करना श्रेयकर॰॰॰॰॰॰ परमात्मा बनने की ताकत केवल मनुष्य में॰॰॰॰॰॰

Thursday, December 20, 2007

दुर्गुण व सदगुण एक साथ नहीं रह सकतेः पू॰सा॰संवेगनिधी श्रीजी म॰सा॰


दुर्गुण व सदगुण एक साथ नहीं रह सकतेः पू॰सा॰ संवेगनिधी श्रीजी म॰सा॰

जहां दुर्गुण आयेंगे, वहां से सदगुण चले जाते हैं।सुर्य की लोक महत्ता एवं लोक प्रसिद्धि तो बहुत है, लेकिन कम महत्व होने के बावजूद शीतलता के कारण चद्रंमा की लोकप्रियता बहुत है।बुद्धि, शर्म, मर्दानगी, तंदरुस्ती, नम्रता, कोमलता, शीतलता जैसे सारे सदगुण स्त्रीलिंग हैं, जबकि काम, क्रोध, मद, लोभ, रोग जैसे दुर्गुण पुर्लिंग हैं। ''बुद्धी'' दिमाग में, ''शर्म'' आंखों में, ''मर्दानगी'' दिल में और ''तंदरुस्ती'' पेट में वास करती है। लेकिन दिमाग में क्रोध आ जाने से, आंखों में काम, दिल में भय और उदर में रोग आ जाने से सदगुण वहां से गायब हो जाते हैं। सदगुण और दुर्गुण एक साथ नहीं रह सकते। क्रोध से शान्ती संपत्ती और सोभाग्य का नाश होता है। क्रोध भूत के समान ताकतवर होता है, इसलिये इससे बचना चाहिये। क्रोध आने से कोई खुश नहीं होता, लेकिन क्रोध के चले जाने से सभी प्रसन्न जरुर होते हैं। हंसने से शरीर की १८ नाड़ीयों को श्रम करना पड़ता है, जबकि क्रोध से ६३ नाड़ीयों पर दष्प्रभाव पड़ता है। गुस्से में शरीर पर तीनों ऋतुऒं का प्रभाव एक साथ दिखाई देता है, दिमाग गर्म, शरीर ठन्डा और मुंह से अपशब्दों की बारिश होती है। क्रोध की गाड़ी चौथे गियर पर चलती है और एक्सीलेटर बहुत पावरफुल होता है, लेकिन इसमें ब्रेक नहीं होता। क्रोध हिंसा का मूल है इसलिये इससे बचना चाहिये।

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