पूज्य साध्वी संवेगनिधि श्रीजी म॰ सा॰

मनुष्य जीवन में दुर्लभ हैं पांच सकार॰॰॰॰॰॰ जीवन में सुवास देता है विनयभाव॰॰॰॰॰॰ अनुभव में होता है जीवन का सार॰॰॰॰॰॰ आप स्वयं परिवार के लिये आदर्श स्थापित करें॰॰॰॰॰॰ संकल्प करने से असंभव भी संभव बन जाता है॰॰॰॰॰॰ धन का उपयोग दो क्षेत्रों करना श्रेयकर॰॰॰॰॰॰ परमात्मा बनने की ताकत केवल मनुष्य में॰॰॰॰॰॰

Friday, December 21, 2007

पुण्य के बगैर कुछ नहीं मिलताः पू॰सा॰ संवेगनिधि श्रीजी म॰सा॰


पुण्य के बगैर कुछ नहीं मिलताः पू॰सा॰ संवेगनिधि श्रीजी म॰सा॰
अहंकार किसी को झुकने नहीं देता और जो झुकता नहीं, उसे प्रभु की कृपा नहीं मिलती। परिवार, पति, पैसा सब परमात्मा से बंधे हैं। परमात्मा को प्रसन्न करने पर ये सभी चीजें ठीक चलतीं है। परमात्मा सभी शक्तियों के नायक व दायक हैं। उनके पास सारी शक्तियां हैं और उनकी भक्ति करने से वे सारी शक्तियां आपको दे सकते हैं। पाप, दुख और पुण्य, सुख पैदा करता है। परमात्मा से प्रेम करने पर ही पुण्य की वृद्धि होती है। पुण्य कम होगा तो सुख मिलने में संदेह बना रहेगा। यदि सुख कम होने लगे तो पुण्य को बढ़ा दो। पुण्य के बगैर कुछ नहीं मिलता। परमात्मा की शक्ति अर्थात अदृश्य की ताकत असीमित होती है, जबकि दृश्य पदार्थ की ताकत सीमित होती है। भगवान अदृश्य शक्ति प्रदान करते हैं। धर्मी व्यक्ति ने क्या नहीं छोड़ा इसे ध्यान में रखना चाहिये। धर्मी व्यक्ति धन-संपत्ति, सुख-सुविधायें व संसारी वस्तुऒं का त्याग करता है, लेकिन पापी व्यक्ति संसारी वस्तुऒं के लिये धर्म, गुरु एवं देव का त्याग कर देता है http://picasaweb.google.com/mukesh.gajja/SanvegnidhiShriJiMaSaThanaAathChaturmas

व्यक्ती, द्रव्य, क्षेत्र, काल, व भाव से गुस्से को सम्हालना चाहियेः पू॰सा॰ संवेगनिधि श्रीजी म॰सा॰


व्यक्ती, द्रव्य, क्षेत्र, काल, व भाव से गुस्से को सम्हालना चाहियेः पू॰सा॰ संवेगनिधि श्रीजी म॰सा॰
क्रोध को नियंत्रित करने के लिये पांच तत्वों का सहारा लेना चाहिये - व्यक्ती, द्रव्य, क्षेत्र, काल, व भाव से गुस्से को सम्हालना चाहिये। अपने से बड़े व्यक्ती, छोटे नुकसान पर, धार्मिक स्थान पर और शुभ प्रसंगो के समय गुस्सा नहीं करने का संकल्प लेना चाहिये।परिवार के बड़े सदस्यों को आम के वृक्ष के की तरह होना चाहिये जो छाया और फल दोनों देते हैं। नारियल का पेड़ फल देता है लेकिन छाया नहीं देता और बरगद के पेड़ से छाया तो मिलती है लेकिन फल नहीं मिलता। बुजुर्गों को अपने आश्रितों को साधन सुविधायें और प्यार दोनो देना चाहिये। परिवार - समाज मे समरसता बढ़ाना चाहिये। गुस्सा सरसता को निगल जाता है। इसलिये क्रोध का त्याग करना चाहिये। बोलना तो सबको आता है, लेकिन क्या और कैसे बोलना है यह बुजुर्गों को भी सीखते रहना चाहिये। यदि अच्छा बोलना न आये, तो मौन साध लेना चाहिये, इससे सरसता बनी रहेगी। प्रेम की रिक्तता धन संपत्ती से नहीं भरी जा सकती, लेकिन धन कि रिक्तता को प्रेम से भरा जा सकता है

Thursday, December 20, 2007

दुर्गुण व सदगुण एक साथ नहीं रह सकतेः पू॰सा॰संवेगनिधी श्रीजी म॰सा॰


दुर्गुण व सदगुण एक साथ नहीं रह सकतेः पू॰सा॰ संवेगनिधी श्रीजी म॰सा॰

जहां दुर्गुण आयेंगे, वहां से सदगुण चले जाते हैं।सुर्य की लोक महत्ता एवं लोक प्रसिद्धि तो बहुत है, लेकिन कम महत्व होने के बावजूद शीतलता के कारण चद्रंमा की लोकप्रियता बहुत है।बुद्धि, शर्म, मर्दानगी, तंदरुस्ती, नम्रता, कोमलता, शीतलता जैसे सारे सदगुण स्त्रीलिंग हैं, जबकि काम, क्रोध, मद, लोभ, रोग जैसे दुर्गुण पुर्लिंग हैं। ''बुद्धी'' दिमाग में, ''शर्म'' आंखों में, ''मर्दानगी'' दिल में और ''तंदरुस्ती'' पेट में वास करती है। लेकिन दिमाग में क्रोध आ जाने से, आंखों में काम, दिल में भय और उदर में रोग आ जाने से सदगुण वहां से गायब हो जाते हैं। सदगुण और दुर्गुण एक साथ नहीं रह सकते। क्रोध से शान्ती संपत्ती और सोभाग्य का नाश होता है। क्रोध भूत के समान ताकतवर होता है, इसलिये इससे बचना चाहिये। क्रोध आने से कोई खुश नहीं होता, लेकिन क्रोध के चले जाने से सभी प्रसन्न जरुर होते हैं। हंसने से शरीर की १८ नाड़ीयों को श्रम करना पड़ता है, जबकि क्रोध से ६३ नाड़ीयों पर दष्प्रभाव पड़ता है। गुस्से में शरीर पर तीनों ऋतुऒं का प्रभाव एक साथ दिखाई देता है, दिमाग गर्म, शरीर ठन्डा और मुंह से अपशब्दों की बारिश होती है। क्रोध की गाड़ी चौथे गियर पर चलती है और एक्सीलेटर बहुत पावरफुल होता है, लेकिन इसमें ब्रेक नहीं होता। क्रोध हिंसा का मूल है इसलिये इससे बचना चाहिये।

Monday, October 29, 2007

पूज्य साध्वी संवेगनिधी श्रीजी म॰ सा॰ ठाणा आठ


''पूज्य साध्वी संवेगनिधी श्रीजी म॰सा॰ थाणा आठ'' चतुर्मास,२२ जुलाई से २९ नवम्बर २००७ रायपुर (छ॰ग॰)
पूज्य साध्वी संवेगनिधी श्रीजी म॰ सा॰ ठाणा आठ ने अपनी शिष्याऔं ०१ - पू॰ सा॰ धैर्य निधी श्रीजी म॰ सा॰, ०२ - पू॰ सा॰ बोधिनिधी श्रीजी म॰ सा॰, ०३ - पू॰ सा॰ पर्वनिधी श्रीजी म॰ सा॰, ०४ - पू॰ सा॰ देशनानिधी श्रीजी म॰ सा॰, ०५ - पू॰ सा॰ ध्याननिधी श्रीजी म॰ सा॰, ०६ - पू॰ सा॰ श्रद्धानिधी श्रीजी म॰ सा॰, ०७ - पू॰ सा॰ सुकृतनिधी श्रीजी म॰ सा॰ के साथ शंकर नगर जैन श्री संघ, संदीप जैन भवन में २२ जुलाई से २९ नवम्बर २००७ तक अपनी अमृत-वाणी की वर्षा कर धर्मावलंबियों को लाभांवित किया । श्री विनायक सेवा समिति के सदस्यों ने जोर-शोर से उनके प्रवचनों को समिति के संरक्षकगण आदरणीय श्री अनूपचंद जैन जी एवं पूज्य माताजी श्रीमती गुणमाला जैन जी के आशीर्वाद से समिति के अध्यक्ष एवं संयोजक श्री अनिल जैन जी के कुशल मार्ग-दर्शन में समिति के सचिव श्री राजेश बिस्सा ने अपने साथी स्वयंसेवकों श्री संजय सिंह ठाकुर एवं श्री धनवेंद्र जायसवाल के साथ जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया